कानपुर। ऐतिहासिक, औद्योगिक और क्रांति की नगरी कानपुर की समस्याओं को लेकर एक नागरिक की ओर से तत्कालीन जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह को सौंपे गए पत्र ने शहर की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर बहस छेड़ दी है। पत्र में झकरकटी बस अड्डा, अस्पताल, सड़क, सफाई, भ्रष्टाचार और विकास परियोजनाओं को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं।
पत्र में जिलाधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कई ऐसे कार्यों का उल्लेख किया गया है, जो वास्तव में विभिन्न विभागों, शासन अथवा कार्यदायी संस्थाओं से जुड़े हैं। ऐसे में पूरे शहर की हर अधूरी परियोजना की जिम्मेदारी अकेले जिलाधिकारी पर डालना प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविकता को सरल बनाकर देखने जैसा होगा।
जितेंद्र प्रताप सिंह के कानपुर जिलाधिकारी के कार्यकाल के दौरान सामने आए प्रशासनिक रिकॉर्ड पर नजर डालें तो तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है। उनके कार्यकाल में लगातार औचक निरीक्षण, अधिकारियों की अनुपस्थिति पर कार्रवाई और विकास योजनाओं की समीक्षा की खबरें सामने आती रही हैं।
सितंबर 2026 में ही प्रादेशिक सेवायोजन कार्यालय के औचक निरीक्षण में पांच वरिष्ठ सहायक अनुपस्थित मिले। जिलाधिकारी ने सभी के एक दिन का वेतन काटने के निर्देश दिए।
इससे पहले अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री डैशबोर्ड पर दर्ज विकास योजनाओं की समीक्षा के दौरान लापरवाही पर अधिकारियों को फटकार लगाई गई। बिना अनुमति बैठक से अनुपस्थित अधिकारियों के वेतन रोकने के निर्देश भी दिए गए।
जून 2026 में सीएम डैशबोर्ड की समीक्षा के दौरान भी अनुपस्थित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। तीन अधिकारियों का वेतन रोकने के निर्देश दिए गए थे।
औद्योगिक विभाग भी उनके निरीक्षण से अछूता नहीं रहा। मई 2026 में फजलगंज स्थित उपायुक्त उद्योग कार्यालय के निरीक्षण में छह कर्मचारी अनुपस्थित मिले, जिनका एक दिन का वेतन काटने के निर्देश दिए गए।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने स्वयं जमीनी निरीक्षण किया। अगस्त में प्राथमिक विद्यालय लोधवा खेड़ा के निरीक्षण में पांच में से चार शिक्षक अनुपस्थित मिले और 106 नामांकित बच्चों में केवल तीन बच्चे उपस्थित पाए गए। इसके बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
स्वास्थ्य व्यवस्था में भी उनका औचक निरीक्षण चर्चा में रहा। फरवरी 2025 में मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय के निरीक्षण में बड़ी संख्या में कर्मचारी अनुपस्थित पाए गए थे। इसके अलावा शहरी स्वास्थ्य केंद्र के निरीक्षण में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज उपचार और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर सामने आने पर कार्रवाई की पहल की गई थी।
अब बात उन बड़े विकास कार्यों की, जिनका उल्लेख नागरिक के पत्र में किया गया है। उदाहरण के लिए झकरकटी बस अड्डे का पुनर्विकास किसी एक जिलाधिकारी के आदेश से पूरा होने वाली परियोजना नहीं है। जून 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 143 करोड़ रुपये की परियोजना की डीपीआर और लेआउट तैयार हो चुका था तथा बस अड्डे को सिग्नेचर सिटी और विकास नगर की ओर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी।
इसी तरह जल जीवन मिशन की परियोजनाओं का निरीक्षण भी जिलाधिकारी स्तर पर किया गया। जून 2026 में बौढ़नपुर-चौधरीपुर की करीब 3.45 करोड़ रुपये की लागत वाली ओवरहेड टंकी का निरीक्षण करते हुए परियोजना के उपयोग और जलापूर्ति की स्थिति पर अधिकारियों से जवाब मांगा गया।
इसलिए यह कहना उचित होगा कि कानपुर की सभी समस्याओं का समाधान जिलाधिकारी के स्तर पर होना संभव नहीं है। नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, केडीए, यूपीएसआरटीसी, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, जल निगम, शासन और अन्य कार्यदायी संस्थाओं की अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं। जिलाधिकारी इन विभागों के बीच समन्वय, समीक्षा और कार्रवाई सुनिश्चित करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन हर परियोजना के निर्माण की एजेंसी स्वयं जिलाधिकारी नहीं होते।
नागरिक द्वारा उठाए गए सवालों को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं होगा। कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहर में जाम, टूटी सड़कें, प्रदूषण, सफाई, अवैध कब्जे और विकास परियोजनाओं में देरी वास्तविक समस्याएं हैं। इन पर जनता को जवाब मिलना चाहिए। लेकिन जवाबदेही तय करते समय यह देखना भी जरूरी है कि किस काम की जिम्मेदारी किस विभाग की है और उसमें जिलाधिकारी की वास्तविक भूमिका क्या है।
जितेंद्र प्रताप सिंह के कार्यकाल का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना कि कौन-सी परियोजना उनके कार्यकाल में पूरी हुई और कौन-सी नहीं, अधूरा मूल्यांकन होगा। यह भी देखना होगा कि उन्होंने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए कितनी कार्रवाई की, कितने औचक निरीक्षण किए और लंबित योजनाओं की कितनी समीक्षा की।
कानपुर के नागरिकों को निश्चित रूप से यह जानने का अधिकार है कि शहर की बड़ी परियोजनाएं कब पूरी होंगी। लेकिन प्रशासन से सवाल पूछने के साथ यह भी जरूरी है कि सवाल सही स्तर पर पूछा जाए।
कानपुर को बेहतर प्रशासन चाहिए, न कि केवल आरोप-प्रत्यारोप। यदि किसी परियोजना में देरी है तो उसकी जिम्मेदारी तय हो, समयसीमा सार्वजनिक हो और संबंधित विभाग से जवाब लिया जाए। इसी प्रक्रिया में तत्कालीन जिलाधिकारी की भूमिका का भी निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए।
उपलब्ध घटनाक्रम यह संकेत जरूर देता है कि जितेंद्र प्रताप सिंह के कार्यकाल को केवल “कुछ नहीं किया” कहकर समाप्त कर देना तथ्यों की पूरी तस्वीर नहीं है। उनके कार्यकाल में प्रशासनिक लापरवाही पर कार्रवाई और जमीनी निरीक्षण के कई उदाहरण सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि कानपुर के विकास पर बहस व्यक्ति-केंद्रित न होकर काम, जिम्मेदारी और परिणाम-केंद्रित हो।







